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बलात्कार पीड़ितों के दर्द


बलात्कार के मामलों में जब अभियुक्तों द्वारा पीड़ितों के साथ बलात्कार किया जाता है, जब वे पुलिस स्टेशन जाते हैं तो आम तौर पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से इनकार करते हैं कि रिपोर्ट दर्ज करने के लिए कानून के अनिवार्य प्रावधान हैं, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित कई निर्णय पुलिस विभाग इन वर्गों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई मूल्य नहीं है। शिकायत दर्ज करने या एफआईआर दर्ज करने के बाद इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे न्याय मिलेगा।






उसके वास्तविक परीक्षण परीक्षण में शुरू आरोपी के वकील के मुकदमे के दौरान पूछा ........

जब आपके साथ रेप हो रहा था तब क्या आप रोईं थीं ?

- आपने शोर मचाने की कोशिश की थी ?

- जब आपका रेप हो रहा था तब क्या आप डरी थीं ?

- क्या आप चिल्लाई थीं या फिर रेपिस्ट को नाखून से नोचने की कोशिश की थी ?

इससे भी ज्यादा निजी सवाल जैसे कपड़े कैसे थे, कहां तक कपड़े उतारे गए थे, कहां-कहां छुआ गया था, कितना समय लगा था वगैरह-वगैरह...

रेप के अलग-अलग मामलों में वकीलों ने रेप पीड़‍ितों से जो सवाल पूछे हैं और जिस तरह से पूछे हैं, उसमें संवेदना तो छोड़ि‍ए रेप के जख्‍मों को फिर से कुरेदने की कोशिश ज्‍यादा लगती है. 2013 में क्रिमिनल लॉ में बदलाव होने के बाद NGO पार्टनर्स फॉर लॉ डेवलपमेंट ने रेप के मुकदमों का अध्‍ययन किया है. इस स्‍टडी का मकसद था ये देखना कि आखिर नए नियम किस तरह से लागू किए जा रहे हैं और उनका सही इस्तेमाल हो रहा है कि नहीं.

इस स्‍टडी के नतीजे चौंकाने वाले हैं. 2012 में निर्भया केस के बाद उम्‍मीद की जा रही थी कि रेप पीड़ि‍तों के साथ व्‍यवहार में संवेदनशीलता आएगी. लेकिन रेप से जुड़े कानून सख्‍त होने का सीधा असर बचाव पक्ष की आक्रामकता के रूप में दिखाई दे रहा है. एक ओर दरिंदगी और उसपर लोगों के ताने. इतने पर भी किसी की हिम्मत अगर कोर्ट केस करने की हो गई तो उसे वकीलों के ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है कि इंसानियत भी शर्मसार हो जाए.

जब फिल्म पिंक में तापसी पन्नु से रेप से जुड़े सवाल किए जाते हैं और उसे निर्दोष होने पर भी शर्मिंदा किया जाता है तब दिल दहल जाता है. फिल्मों में ऐसा कई बार देखा-सुना गया है, लेकिन शायद असलियत इससे काफी ज्यादा घिनौनी है. दिल्ली के रेप ट्रायल्स पर एक रिसर्च की गई है. इसमें जो सच्चाई सामने आई वो किसी के भी रोंगटे खड़े कर देगी. इस स्टडी में 16 रेप केस जिनमें पीड़िता के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया गया. उससे निजी सवाल पूछे गए, उसे डराया गया और कुछ में तो भरे कोर्ट रूम में उसे धमकाया भी गया.

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कैसे-कैसे सवाल...

कई बार कोर्ट रूम में इस तरह के सवाल किए जाते हैं कि रेप पीड़िता के लिए वो किसी दूसरे रेप जैसा ही होता है. एक क्रिमिनल लॉयर रिबेका जॉन का कहना है कि रेप ट्रायल के दौरान रेप पीड़िता की सेक्शुअल हिस्ट्री को भी कोर्ट रूम में जग जाहिर किया जाता है. मेडिकल चेकअप भी पीड़िता का वैसे ही किया जाता है जैसे आदिकाल से चला आ रहा है. टू फिंगर टेस्ट जिसे खुद एक रेप की तरह माना जाता है वो अब भी उसी लेवल पर जारी है.

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रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि रेप पीड़िता को रेपिस्ट और उसके परिवार से प्रोटेक्शन देना चाहिए.

निर्भया मामले में भी पूछे गए ऐसे सवाल...

एक रिपोर्ट के मुताबिक 16 दिसंबर दिल्ली गैंगरेप मामले में वकील ने ऐसे सवाल पूछे थे जिन्हें सुनकर शायद निर्भया की आत्मा रोई हो.

फास्ट ट्रैक कोर्ट में डिफेंस लॉयर ने कई सवाल किए थे. ये साबित करने के लिए कि निर्भया का साथी जो उस वक्त उसके साथ था वो विश्वसनीय नहीं है वकील ने पूछा था कि क्या निर्भया के साथ उसके कोई शारिरीक संबंध थे?

इस बात पर जज ने वकील वी के आनंद को सिर्फ केस से जुड़े सवाल पूछने को कहा. वी के आनंद तब भी नहीं रुके और कहा कि निर्भया के दोस्त के कई लड़कियों से संबंध हैं. इसके अलावा, उस दिन निर्भया और उसका दोस्त कुछ कर रहे होंगे तभी उन लड़कों ने निर्भया पर हमला किया और उसे रेप किया. निर्भया और उसके दोस्त के बर्ताव से ही वो सभी ऐसी हरकत करने को प्रेरित हुए.

इसपर जज ने आनंद को डांट लगाई, प्रॉसिक्यूशन ने भी इसकी कड़ी आलोचना की. आनंद से कहा गया कि वो एक महिला की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं. आनंद फिर भी नहीं माने और इस तरह के सवाल करते रहे जिससे निर्भया की गरिमा को ठेस पहुंची होगी और उसके दोस्त का मनोबल टूटा होगा.

ये थी उस केस की बात जिसके बारे में जानकर पूरी दुनिया दहल गई थी. सिर्फ भारत में ही नहीं विश्व भर में इस रेप की निंदा हुई थी. लोग रोए थे, उसके दर्द को महसूस किया था. सारे सबूत सामने थे फिर भी वकील ने कैसे सवाल किए. तो जरा सोचिए जिन केस के बारे में पता नहीं होता उसमें रेप पीड़िता का क्या होता होगा.

2012 की उस घटना के बाद कई नियम बदले गए, लेकिन आखिर हुआ क्या? अपराधियों के लिए अगर कड़े नियम बनाए गए तो उन्हें बचाने वाले और क्रूर हो गए. लड़कियों को ही गलत साबित करने की होड़ में वो ये भी भूल गए कि ऐसे सवालों में इंसानियत की कोई जगह ही नहीं बची. किसी भी रेप विक्टिम या उसके परिवार वालों या दोस्तों से किए जाने वाले ऐसे सवाल सिर्फ मनोबल तोड़ने का काम करते हैं. अगर अब भी इसपर कार्यवाही नहीं हुई तो शायद हिम्मत कर रेप की रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली लड़कियां और भी डरने लगेंगी.

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